
अक्सर विवादों में रहने वाले मसूरी विधायक एवं धामी सरकार के ताकतवर मंत्री गणेश जोशी की बढ सकती हैं मुश्किलें। मामला आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में नैनीताल हाईकोर्ट में अधिवक्ता विकेश नेगी ने उनके खिलाफ एक याचिका दायर की । जिसकी सुनवाई के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने अपना फैसला रिजर्व रखा । लेकिन मंत्री गणेश जोशी ने न्याय प्रक्रिया को भी राजनीतिक चश्मे से देखा ।सत्ता के अहंकार की चासनी में डूबे मंत्री जी ने मीडिया के सामने कहा सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता उन्होंने माननीय उच्च न्यायालय का भी आभार व्यक्त किया और कहा दिया कि पिटीशन डालने वाले व्यक्ति की याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर उन पर सख्त टिप्पणी की । इस पर याचिकाकर्ता विकेश नेगी ने कहा कि मंत्री गणेश जोशी द्वारा न्याय पालिका पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं क्योंकि फैसला अभी रिजर्व में है। फिर सोशल मीडिया में गणेश की खूब किरकिरी हुई। आज एक बार फिर इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय ने अपने बैंच से इस फैसले को रिलीज कर मुख्य न्यायाधीश को हस्तांतरित कर दिया । इस फैसले से जहां हर किसी को न्याय पालिका पर भरोसा बढ़ा वहीं मंत्री गणेश जोशी को एक बड़ा झटका लगा और उनकी किरकिरी हो रही है। गणेश जोशी पर आय से अधिक सम्पत्ति के अलावा उद्यान घोटाला सैन्य धाम में घोटाले पर भी आरोप लग रहे हैं। फिर भी धामी सरकार इन घोटालों पर पर्दा डाल कर उनकी पीठ थपथपा रही है। और हर मामले में उनका बचाव कर रही है लेकिन इस मामले में मंत्री फंसते नजर आ रहे हैं कानून के जानकारों का मानना है कि
यह अपराध की श्रेणी में आ सकता है। सीधे तौर पर “जजमेंट आ गया” कहना झूठ है, क्योंकि जजमेंट रिजर्व है।
इस स्थिति में 3 अलग-अलग कानूनों से कार्रवाई हो सकती है:
1. न्यायालय की अवमानना – सबसे बड़ा अपराध
Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 2(c)
जब कोई मामला Reserved for Judgment होता है, तब तक कोर्ट की कार्यवाही पेंडिंग मानी जाती है।
बिना आदेश के मीडिया / सोशल मीडिया पर आकर यह कहना कि “मेरे पक्ष में फैसला आ गया, आरोप खारिज हो गए” – यह:
• न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप है • जनता को गुमराह करना है • न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाना है
इसे Criminal Contempt माना जाता है। हाई कोर्ट खुद संज्ञान लेकर अवमानना का नोटिस जारी कर सकता है। इसमें 6 महीने तक की सजा और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
2. न्याय में बाधा डालना और झूठी जानकारी फैलाना
भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत:
• धारा 229 – न्यायिक कार्यवाही में झूठा बयान देना / झूठी सूचना देना • धारा 353(1)(b) – अफवाह या गलत सूचना फैलाना जिससे पब्लिक में भ्रम पैदा हो • यदि उसने फर्जी ऑर्डर दिखाया है तो धारा 319, 335 – जालसाजी भी लगेगी 3. अगर सोशल मीडिया पर वीडियो / पोस्ट डाला है
तो IT Act 2000 की धारा 66 और BNS की मानहानि से जुड़ी धाराओं में भी शिकायत हो सकती है, खासकर यदि दूसरे पक्ष की छवि खराब करने के लिए ऐसा किया गया हो।
व्यावहारिक रूप से क्या होता है?
1. दूसरा पक्ष उसी हाई कोर्ट में एक Application / Contempt Petition दाखिल करके उस वीडियो / अखबार की कटिंग को सबूत के तौर पर लगा सकता है।
2. कोर्ट उस व्यक्ति को तलब करके पूछेगी कि जब फैसला सुनाया ही नहीं गया तो आपने ऐसा क्यों कहा?
3. कोर्ट चाहे तो जजमेंट सुनाते समय इस आचरण को भी ध्यान में रख सकती है। ये Contempt of Court का सीधा मामला बनता है।
