नेताओं के बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों के लिए सियासत के दरवाजे खुले, वर्षों से झंडे-डंडे उठाने वाले कार्यकर्ता अब भी कतार में!
गिरिराज उनियाल | विशेष राजनीतिक टिप्पणी | देहरादून
राजनीति में संघर्ष, संगठन के प्रति समर्पण और जनता के बीच काम करने को किसी भी राजनीतिक कार्यकर्ता की पहचान माना जाता है। लेकिन जब राजनीतिक दलों में नेताओं के बेटे-बेटियों, पत्नी और रिश्तेदारों को आगे बढ़ाने की चर्चा तेज होती है, तो वर्षों से पार्टी के लिए पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या राजनीति में आगे बढ़ने का रास्ता संगठन के संघर्ष से होकर गुजरता है या फिर परिवारवाद की बेल का सहारा लेकर भी सत्ता और संगठन के शीर्ष तक पहुंचा जा सकता है?
उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों यह सवाल खासा प्रासंगिक है। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच कई राजनीतिक परिवारों के सदस्यों के नाम चर्चा में हैं। कोई पिता की राजनीतिक विरासत के सहारे पहचान बना रहा है, तो किसी के लिए मां, पिता या परिवार का राजनीतिक रसूख आगे बढ़ने का आधार बनता दिखाई देता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उन हजारों कार्यकर्ताओं का है, जो वर्षों से पार्टी का झंडा उठाए हुए हैं, लेकिन टिकट और बड़े संगठनात्मक पदों की बारी आने पर खुद को पीछे खड़ा पाते हैं।
परिवारवाद की बेल पर चढ़ने वालों की लंबी होती कतार
भाजपा लंबे समय से कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों पर परिवारवाद को लेकर हमलावर रही है। लेकिन उत्तराखंड में भाजपा के भीतर भी राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी की सक्रियता इस बहस को जन्म देती है कि परिवारवाद की बेल आखिर किस-किस के आंगन में फैल रही है।
मसूरी के विधायक और कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी की बेटी नेहा जोशी भाजपा के संगठनात्मक और राजनीतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रही हैं। उनके नाम को मसूरी की राजनीति और भविष्य की संभावित उम्मीदवारी से जोड़कर चर्चाएं होती रही हैं। हालांकि, उन्हें 2027 में मसूरी से टिकट दिए जाने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरासत से मिली पहचान ही आगे बढ़ने का आधार बनेगी या संगठन के सामान्य कार्यकर्ताओं को भी उतने ही अवसर मिलेंगे?
देहरादून कैंट की राजनीति में पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्वर्गीय हरबंस कपूर की पत्नी सविता कपूर विधायक हैं। वह 2021 के उपचुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव में जीती थीं। अब उनके बेटे अमित कपूर को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं होती हैं। दूसरी ओर, दिवंगत भाजपा नेता उमेश अग्रवाल के बेटे सिद्धार्थ अग्रवाल महानगर भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इन उदाहरणों के बीच सवाल उठता है कि क्या संगठन में पद और राजनीतिक अवसर पाने की कसौटी सभी के लिए एक समान है?
हल्द्वानी और कालाढूंगी की राजनीति में भी वरिष्ठ भाजपा नेता बंशीधर भगत के बेटे विकास भगत का उदाहरण सामने है। विकास भगत कालाढूंगी से विधायक हैं। यहां भी राजनीतिक परिवार से आने और अपने व्यक्तिगत राजनीतिक काम के आधार पर पहचान बनाने के बीच अंतर को समझना जरूरी है।
बेचारा कार्यकर्ता—झंडा उठाओ, दरी बिछाओ और जय-जयकार करो!
राजनीतिक परिवारों की चर्चा के बीच उस कार्यकर्ता की कहानी अक्सर पीछे छूट जाती है, जो पार्टी के लिए दिन-रात मेहनत करता है। चुनाव आता है तो वह प्रचार में जुट जाता है, रैलियों में भीड़ जुटाता है, झंडे लगाता है, दरी बिछाता है, मंच सजाता है और नेताओं के स्वागत में नारे लगाता है।
उसकी आवाज पार्टी के नारों में गूंजती है—‘जय हो’, ‘जिंदाबाद’, ‘पार्टी जिंदाबाद’। लेकिन जब टिकट वितरण या बड़े पदों पर नियुक्ति की बारी आती है, तो वर्षों से संघर्ष कर रहा वही कार्यकर्ता अक्सर कतार में खड़ा रह जाता है।
उसने संगठन के लिए समय दिया, विरोध झेला, चुनावों में मेहनत की और कई बार अपने संसाधन तक खर्च किए। मगर राजनीतिक विरासत लेकर आने वाले किसी चेहरे के सामने उसका वर्षों का संघर्ष कितना महत्व रखता है? क्या पार्टी के प्रति निष्ठा का पुरस्कार केवल नारों, भीड़ और चुनावी प्रबंधन तक सीमित रहना चाहिए?
यही वह सवाल है जो परिवारवाद की बेल को खाद-पानी देने वाली राजनीतिक व्यवस्था पर बहस की मांग करता है।
कांग्रेस में भी परिवारवाद की बेल खूब फैली
परिवारवाद के आरोप केवल भाजपा तक सीमित नहीं हैं। कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत हरिद्वार ग्रामीण से विधायक रह चुकी हैं। उनके बेटे भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। पूर्व मंत्री यशपाल आर्य के बेटे संजीव आर्य नैनीताल से विधायक रह चुके हैं।
पूर्व मंत्री इंदिरा हृदयेश के बेटे सुमित हृदयेश हल्द्वानी से विधायक हैं। पूर्व मंत्री ब्रह्मदत्त के बेटे नवप्रभात भी विधायक रह चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बी.सी. खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी भूषण विधानसभा अध्यक्ष रह चुकी हैं, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा राज्य सरकार में मंत्री रहे हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने का चलन किसी एक दल तक सीमित नहीं है। यही वजह है कि परिवारवाद के विरुद्ध राजनीतिक दलों की घोषणाओं और उनके व्यवहार के बीच समानता की मांग उठती रहती है।
पंचायत से विधानसभा तक परिवारवाद की बेल
उत्तराखंड में राजनीतिक परिवारों का प्रभाव केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। जिला पंचायत और ब्लॉक प्रमुख जैसे पदों पर भी राजनीतिक परिवारों से जुड़े लोगों की सक्रियता दिखाई देती है।
मातबर सिंह कंडारी के परिवार के सदस्य क्षेत्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। मुन्ना सिंह चौहान की पत्नी मधु चौहान जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं और चकराता से विधानसभा चुनाव लड़ चुकी हैं। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी स्थानीय निकायों से लेकर विधानसभा तक दिखाई देती है।
हालांकि, किसी नेता का रिश्तेदार होना अपने आप में अयोग्यता का प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों में सामान्य कार्यकर्ता को भी उतना ही अवसर मिलता है, जितना किसी स्थापित राजनीतिक परिवार से आने वाले व्यक्ति को?
भाजपा के लिए भी परीक्षा से कम नहीं परिवारवाद का सवाल
भाजपा विपक्षी दलों के परिवारवाद को लेकर लगातार सवाल उठाती रही है। ऐसे में उत्तराखंड में उसके नेताओं के परिजनों की राजनीतिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पार्टी के सामने चुनौती यह है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को भरोसा दिलाए कि संगठन में आगे बढ़ने का रास्ता केवल राजनीतिक विरासत से नहीं, बल्कि मेहनत, समर्पण, जनाधार और संगठनात्मक योगदान से भी खुलता है।
कांग्रेस हो या भाजपा, किसी भी दल के लिए यह दावा करना आसान है कि उसका कार्यकर्ता सर्वोपरि है। लेकिन उस दावे की असली परीक्षा तब होती है, जब टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियों और राजनीतिक जिम्मेदारियों के बंटवारे का समय आता है।
परिवारवाद की बेल बनाम कार्यकर्ता का संघर्ष
लोकतंत्र में हर नागरिक को राजनीति में आने का अधिकार है। किसी राजनीतिक परिवार से आने वाले व्यक्ति को भी जनता के बीच काम करने और अपनी योग्यता साबित करने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन जब राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी को मिलने वाले अवसरों की तुलना वर्षों से संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं से की जाती है, तो अवसरों की समानता का सवाल खड़ा होना लाजिमी है।
परिवारवाद की बेल पर चढ़कर आगे बढ़ने वालों के लिए राजनीति के दरवाजे कितने सहज दिखाई देते हैं, जबकि आम कार्यकर्ता को वर्षों तक झंडे-डंडे उठाने, दरी बिछाने और ‘जय हो-जिंदाबाद’ के नारों तक सीमित रहना पड़ता है—यह अंतर ही आज की राजनीतिक बहस का केंद्र है।
2027 के विधानसभा चुनाव में देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल परिवारवाद की बेल को और फैलने देते हैं या फिर उन कार्यकर्ताओं को भी आगे आने का अवसर देते हैं, जिन्होंने वर्षों तक संगठन की नींव मजबूत की है।
आखिर लोकतंत्र में पार्टी किसी परिवार की निजी विरासत नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं और जनता के विश्वास से खड़ी होने वाली संस्था है। यदि राजनीतिक दल वास्तव में कार्यकर्ता को सर्वोपरि मानते हैं, तो उन्हें यह साबित भी करना होगा कि परिवारवाद की बेल के साये से बाहर निकलकर संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता के लिए भी सत्ता और संगठन के दरवाजे खुले हैं।तरणी पार

