उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान 42 राज्य आंदोलनकारियों ने अपनी शहादत दी थी, तब कही जाकर उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था. रिपोर्ट- धीरज सजवाण.
देहरादून: उत्तराखंड को अलग राज्य के रूप में पहचान मिलने की कहानी केवल राजनीतिक फैसले या प्रशासनिक सीमाओं के बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक जरूरतों और अपने अधिकारों के लिए लंबे समय तक चले संघर्ष की दास्तान है. आज जिस उत्तराखंड को हम देश के 28वें राज्य के रूप में जानते हैं, उसकी मांग आजादी से पहले ही उठने लगी थी. पहाड़ के लोगों को लंबे समय से महसूस हो रहा था कि मैदानी इलाकों से अलग उनकी भौगोलिक परिस्थितियां, जीवनशैली, आर्थिक जरूरतें और सामाजिक समस्याएं हैं. ऐसे में यहां के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था होनी चाहिए, जो पहाड़ की जरूरतों को समझ सके और यह मांग समय के साथ मजबूत होती गई.
खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहे गोलीकांड ने पूरे देश का ध्यान खींचा: अलग-अलग दौर में कई नेताओं, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसे मुद्दे को उठाया, लेकिन निर्णायक मोड़ 1994 के जनआंदोलन के दौरान आया. खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर हुई घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान इस संघर्ष की ओर खींचा. आखिरकार लंबे राजनीतिक घटनाक्रम और आंदोलनकारियों के संघर्ष के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया.
अलग पहचान और अलग प्रशासन की मांग की शुरुआत: उत्तराखंड राज्य आंदोलन की जड़ें समझने के लिए सबसे पहले इस क्षेत्र की भौगोलिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है. हिमालयी क्षेत्र होने के कारण यहां का जनजीवन मैदानी इलाकों से हमेशा अलग रहा है. दूर-दराज के गांव, दुर्गम रास्ते, सीमित संसाधन, खेती और पशुपालन पर निर्भर अर्थव्यवस्था यहां की प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ी चुनौतियां यहां की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही हैं.
ब्रिटिश शासन में अन्य राज्यों से अलग थी प्रशासनिक व्यवस्था: ब्रिटिश शासन के दौरान भी इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था संयुक्त प्रांत के अन्य इलाकों से अलग रखी गई थी. कुमाऊं और गढ़वाल के कई हिस्सों में राजस्व पुलिस की व्यवस्था लागू थी. सामान्य पुलिस व्यवस्था के बजाय राजस्व अधिकारियों के माध्यम से कानून-व्यवस्था से जुड़े काम कराए जाते थे. इसी तरह ब्रिटिश शासन में शेड्यूल्ड डिस्ट्रिक्ट्स एक्ट 1874 और नॉन-रेगुलेशन व्यवस्था जैसे प्रावधानों के तहत भी पहाड़ी क्षेत्रों का प्रशासन संचालित होता रहा. इन व्यवस्थाओं के पीछे पहाड़ की अलग भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी एक कारण थीं.
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का आधार: वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत इस पृष्ठभूमि को उत्तराखंड राज्य आंदोलन की शुरुआती वजहों में से एक मानते हैं. उनका कहना है कि
उत्तराखंड का संघर्ष केवल प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्गठन तक सीमित नहीं था, बल्कि इसकी वजह यहां की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान भी थी. अंग्रेजों के समय से ही इस क्षेत्र की प्रशासनिक व्यवस्था देश के दूसरे हिस्सों से अलग रही. यहां का जनजीवन, संस्कृति और स्थानीय जरूरतें भी अलग थीं. ऐसे में लोगों के बीच यह भावना विकसित होने लगी थी कि पहाड़ के लिए ऐसा शासन और प्रशासन होना चाहिए, जो यहां की परिस्थितियों के अनुसार फैसले ले सके. इसी सोच ने आगे चलकर अलग प्रशासनिक इकाई और फिर अलग राज्य की मांग का आधार तैयार किया.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
20वीं सदी में कुमाऊं परिषद जैसी संस्थाओं का गठन: अलग राज्य की मांग के शुरुआती इतिहास को लेकर अलग-अलग दस्तावेजों और इतिहासकारों के बीच कुछ मतभेद भी मिलते हैं. हालांकि, 20वीं सदी के शुरुआती दशकों में कुमाऊं परिषद जैसी संस्थाओं के गठन के बाद पहाड़ के लोगों की क्षेत्रीय समस्याओं को संगठित तरीके से उठाने की शुरुआत हुई.
साल 1916 में बनी कुमाऊं परिषद ने शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और स्थानीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. परिषद की गतिविधियों ने पहाड़ के लोगों को एक साझा मंच दिया. इस दौर में मांग का स्वरूप आज की तरह पूरी तरह अलग राज्य बनाने का नहीं था, लेकिन पहाड़ की अलग जरूरतों के हिसाब से प्रशासनिक अधिकार और व्यवस्था की मांग लगातार मजबूत हो रही थी.
1938 का श्रीनगर अधिवेशन और आजादी से पहले की कोशिशें: अलग पहाड़ी प्रशासन की मांग को लेकर 1930 के दशक में गतिविधियां और तेज हुईं. साल 1938 में श्रीनगर गढ़वाल में कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अधिवेशन हुआ, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू भी शामिल हुए थे. इस दौरान पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार प्रशासनिक व्यवस्था की जरूरत पर चर्चा हुई.
इस अधिवेशन को उत्तराखंड की क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय अधिकारों की मांग के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. हालांकि, इस अधिवेशन को सीधे अलग उत्तराखंड राज्य के गठन का औपचारिक प्रस्ताव बताने से पहले इसके मूल दस्तावेजों और उस समय के प्रस्तावों को देखना जरूरी है. इतना जरूर है कि आजादी से पहले ही पहाड़ की अलग प्रशासनिक जरूरतों को लेकर आवाज उठने लगी थी.
जयसिंह रावत बताते हैं कि 1938-39 के आसपास दुगड्डा और श्रीनगर जैसे स्थानों पर विभिन्न बैठकों और परिषदों के माध्यम से इस मांग को उठाया गया. उस समय देश में ब्रिटिश शासन था और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 के लागू होने के बाद प्रांतीय स्तर पर सीमित स्वायत्तता और चुनावी प्रक्रिया शुरू हो रही थी. ऐसे दौर में पहाड़ के नेताओं को लगने लगा था कि इस क्षेत्र की अलग परिस्थितियों को देखते हुए यहां के लोगों को शासन और प्रशासन में अधिक अधिकार मिलने चाहिए.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत आगे बताते है कि
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी पहाड़ की अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को स्वीकार किया था और स्थानीय जरूरतों के अनुसार शासन की बात कही थी. इस दौर के दस्तावेजों और नेताओं के वक्तव्यों को अलग-अलग तरीके से समझा जाता रहा है, लेकिन यह स्पष्ट है कि पहाड़ की विशिष्ट पहचान और प्रशासनिक जरूरतों का सवाल आजादी से पहले ही राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन चुका था.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
आजादी से पहले की बैठकों में भी हुई चर्चा: साल 1946 में हल्द्वानी में हुई बैठकों और सम्मेलनों में भी पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक इकाई की जरूरत पर चर्चा हुई. बदरीदत्त पांडे और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जैसे नेताओं ने पहाड़ की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया. हालांकि, 1947 में देश आजाद होने के बाद भी यह मांग पूरी नहीं हो सकी.
टिहरी रियासत साल 1949 में भारत में मिली: आजादी के बाद कुमाऊं और गढ़वाल के पहाड़ी जिले उत्तर प्रदेश का हिस्सा बने, जबकि टिहरी रियासत का भारत में विलय 1949 में हुआ. इस तरह पहाड़ का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था में शामिल हो गया, लेकिन पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों और विकास की जरूरतों को लेकर उठ रहे सवाल खत्म नहीं हुए.
आजादी के बाद भी जारी रही अलग राज्य की मांग: आजादी के बाद अलग पहाड़ी राज्य की मांग को राजनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिशें जारी रहीं. साल 1952 में कम्युनिस्ट नेता पीसी जोशी ने अलग पहाड़ी राज्य की मांग को प्रमुखता से उठाया. पीसी जोशी स्वयं कुमाऊं क्षेत्र से जुड़े थे और उन्होंने पहाड़ की आर्थिक, सामाजिक व प्रशासनिक समस्याओं को अलग नजरिये से देखने की जरूरत बताई. इसके बाद 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ.
राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया के बाद भी पहाड़ की आवाज नहीं सुनी गई: देश में भाषाई और प्रशासनिक आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन पहाड़ी क्षेत्र को अलग राज्य बनाने की मांग को उस समय मंजूरी नहीं मिली. इसके बावजूद यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर बना रहा.
1967 में रामनगर में हुआ महत्वपूर्ण सम्मेलन: साल 1967 में रामनगर में लक्ष्मण सिंह अधिकारी के नेतृत्व में पहाड़ी राज्य की मांग को लेकर एक महत्वपूर्ण सम्मेलन हुआ. इसके बाद पहाड़ी राज्य परिषद जैसी संस्थाओं के माध्यम से अलग राज्य की आवाज को आगे बढ़ाया गया. 1970 के दशक में भी यह मांग अलग-अलग मंचों पर उठती रही.
साल 1973 में तेज हुए प्रयास: साल 1973 में उत्तराखंड पहाड़ी राज्य परिषद के माध्यम से दिल्ली तक आवाज पहुंचाने की कोशिश हुई. पहाड़ के लोगों का कहना था कि लखनऊ में बैठकर उनके गांवों, सड़कों, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है. पहाड़ी जिलों के लिए योजनाएं बनाते समय स्थानीय परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता. रोजगार के सीमित अवसरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण पलायन भी बढ़ रहा था. इन सभी समस्याओं ने अलग राज्य की मांग को धीरे-धीरे एक व्यापक राजनीतिक मुद्दा बना दिया.
नेताओं की एक राय नहीं थी: इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहाड़ के कई बड़े नेता भी सक्रिय थे. गोविंद बल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेताओं ने राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर महत्वपूर्ण पदों पर काम किया, लेकिन अलग राज्य की मांग को लेकर पहाड़ के भीतर और उत्तर प्रदेश की मुख्यधारा की राजनीति में हमेशा एक जैसी राय नहीं रही.
जय सिंह रावत का कहना है कि
उत्तराखंड के कई बड़े राजनीतिक नेताओं का हित बड़े राज्य की राजनीति से जुड़ा हुआ था, वे उत्तर प्रदेश की सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे थे. ऐसे में अलग राज्य बनने पर उनका राजनीतिक दायरा सीमित हो सकता था. यही वजह रही कि पहाड़ के कुछ बड़े नेताओं ने अलग राज्य की मांग का समर्थन नहीं किया और लंबे समय तक यह मांग राजनीतिक स्तर पर आगे नहीं बढ़ पाई.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत के अनुसार वैसे देखा जाए तो इस मुद्दे पर सभी नेताओं की भूमिका और उनके रुख को एक जैसा नहीं माना जा सकता. अलग-अलग समय पर उनके बयान, राजनीतिक परिस्थितियां और फैसले भी अलग रहे.
1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन, आंदोलन को मिला राजनीतिक मंच: अलग राज्य की मांग को संगठित राजनीतिक पहचान देने में उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी की महत्वपूर्ण भूमिका रही. 24 जुलाई 1979 को मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ.
अलग राज्य की मांग ने एक राजनीतिक आंदोलन का रूप लिया: डॉ. देवीदत्त पंत, इंद्रमणि बडोनी, विपिन चंद्र त्रिपाठी और काशी सिंह ऐरी सहित कई नेताओं ने इस संगठन को खड़ा करने में भूमिका निभाई. डॉ. देवीदत्त पंत इसके पहले अध्यक्ष बने. यूकेडी ने पहाड़ के लिए अलग राज्य को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया और गांव-गांव तक इस मांग को पहुंचाने की कोशिश की. यूकेडी के गठन के बाद अलग राज्य की मांग केवल सामाजिक बैठकों और क्षेत्रीय सम्मेलनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया गया.
इंद्रमणि बडोनी ने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाया: यूकेडी ने पहाड़ के विकास, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार, रोजगार और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जैसे मुद्दों को उठाया. इंद्रमणि बडोनी ने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई. उन्हें आगे चलकर उत्तराखंड आंदोलन का गांधी कहा गया.
आंदोलनकारियों ने दिल्ली तक पहुंचाई अपनी आवाज: इंद्रमणि बडोनी ने गांवों में जाकर लोगों को आंदोलन से जोड़ा और अलग राज्य की मांग को आम परिवारों तक पहुंचाया. 1980 के दशक में आंदोलनकारियों ने दिल्ली तक अपनी आवाज पहुंचाई. 1987 में दिल्ली के बोट क्लब पर हुई रैली को भी इस संघर्ष के महत्वपूर्ण पड़ावों में गिना जाता है. हालांकि, यूकेडी के अलावा भी कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ा रहे थे. धीरे-धीरे यह मुद्दा पहाड़ के युवाओं, कर्मचारियों, महिलाओं और आम लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगा.
लोगों की शिकायत थी कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से पहाड़ी जिलों की समस्याओं को समझना और उनका समाधान करना मुश्किल है. सरकारी नौकरियों में अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ ही पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार का सवाल भी आंदोलन का हिस्सा बन गया.;
साल 1994 में आरक्षण के मुद्दे से सड़कों पर उतरा आंदोलन: उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास में 1994 का साल सबसे निर्णायक माना जाता है. उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार थी. सरकार की ओर से शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही थी. पहाड़ी क्षेत्रों में इस फैसले को लेकर विरोध शुरू हुआ.
आंदोलनकारियों और छात्र संगठनों का कहना था कि पहाड़ की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां मैदानी इलाकों से अलग हैं. इसलिए आरक्षण नीति लागू करते समय इन परिस्थितियों का ध्यान रखा जाना चाहिए. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि 1994 का आंदोलन केवल आरक्षण के विरोध से शुरू होकर अलग राज्य की मांग में नहीं बदला था. अलग राज्य की मांग पहले से मौजूद थी.
लंबे समय से जमा असंतोष बाहर आया: आरक्षण का मुद्दा उस समय आंदोलन को व्यापक बनाने वाला तत्काल कारण बना और लंबे समय से जमा असंतोष को एक बड़ा जनआंदोलन मिल गया. शुरुआत में छात्रों और युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए, लेकिन जल्द ही इसमें महिलाएं, कर्मचारी, व्यापारी, सामाजिक संगठन और आम ग्रामीण भी शामिल होने लगे. आंदोलन का दायरा पूरे पहाड़ी क्षेत्र में फैल गया. जगह-जगह जुलूस, धरने, प्रदर्शन और बंद आयोजित किए जाने लगे.
आंदोलन से जुड़ने लगी आम जनता: आंदोलनकारियों की मांग थी कि पहाड़ के लिए अलग राज्य बनाया जाए, ताकि यहां की समस्याओं का समाधान स्थानीय जरूरतों के आधार पर किया जा सके. इस दौरान आंदोलन का नेतृत्व किसी एक संगठन या नेता तक सीमित नहीं रहा. अलग-अलग इलाकों में स्थानीय स्तर पर लोग खुद आगे आए. महिलाओं की भागीदारी इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनी. गांवों से लेकर शहरों तक महिलाओं ने जुलूस निकाले, धरने दिए और आंदोलनकारियों के लिए भोजन व अन्य व्यवस्थाएं कीं.
सरकारी कर्मचारी भी आंदोलन में कूदे: सरकारी कर्मचारियों ने भी कई जगह कामकाज छोड़कर आंदोलन में भाग लिया. दैनिक सांध्य अखबार ‘द वैली मेल’ के संपादक और राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ पत्रकार कांति कुमार इस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि
मैं 1992 में पत्रकारिता के क्षेत्र में आया और 1994 के आंदोलन के प्रत्यक्षदर्शी रहा. उस समय आंदोलन ने विकेंद्रित रूप ले लिया था. यह किसी एक संगठन या नेता के नियंत्रण में नहीं था, बल्कि पूरे पहाड़ की जनता इसमें शामिल हो रही थी. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, महिलाएं और कर्मचारी तक अपने घरों और दफ्तरों से निकलकर सड़कों पर आ रहे थे. आंदोलन की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में लोग अपने स्तर पर प्रदर्शन और आंदोलन की गतिविधियां चला रहे थे.
-कांती कुमार, वरिष्ठ पत्रकार-
खटीमा और मसूरी गोलीकांड ने आंदोलन को दिया निर्णायक मोड़: आंदोलन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव बढ़ने लगा था. 1 सितंबर 1994 को खटीमा में आंदोलनकारियों पर पुलिस ने गोलीबारी की. इस घटना में कई लोगों की मौत हुई और अनेक लोग घायल हुए. इसके अगले दिन यानी 2 सितंबर को मसूरी में भी पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी हुई, जिसमें आंदोलनकारियों के साथ पुलिसकर्मियों की भी जान गई. इन घटनाओं ने पूरे उत्तराखंड में आक्रोश बढ़ा दिया. लोगों ने इसे अलग राज्य की मांग को दबाने की कोशिश के रूप में देखा.
इस तरह देखा जाए तो आंदोलन अब केवल प्रशासनिक मांग नहीं रह गया था, बल्कि गोलीकांडों के बाद यह लोगों के सम्मान, अधिकार और न्याय की लड़ाई भी बन गया. खटीमा और मसूरी की घटनाओं के बाद पहाड़ के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन और तेज हो गए.
2 अक्टूबर 1994 को दिल्ली रवाना हुए आंदोलनकारी: आंदोलनकारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई. इस बीच आंदोलन को दिल्ली तक पहुंचाने की रणनीति भी बनाई गई. 2 अक्टूबर 1994 को गांधी जयंती के अवसर पर बड़ी संख्या में आंदोलनकारी दिल्ली में प्रदर्शन करने के लिए रवाना होने वाले थे. इसी यात्रा के दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर हुई पुलिस कार्रवाई ने आंदोलन के इतिहास में सबसे दर्दनाक अध्याय जोड़ दिया.
रामपुर तिराहा कांड: वह रात जिसने पूरे देश को झकझोर दिया: 1 अक्टूबर 1994 की रात देहरादून में आंदोलनकारियों की भारी भीड़ जुट रही थी. घंटाघर और आसपास के इलाकों में दिल्ली जाने की तैयारी चल रही थी. बसों और अन्य वाहनों की व्यवस्था की जा रही थी. आंदोलनकारियों का हुजूम लगातार बढ़ रहा था. कांति कुमार बताते हैं कि
उस रात देहरादून का माहौल काफी तनावपूर्ण था. मुझे खुद भीड़ और लोगों के गुस्से को देखकर किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी. मैंने अपने करीबी मित्र और आंदोलन के सक्रिय साथी देवकीनंदन पांडे से भी इस चिंता को साझा की थी. मेसे पास उस समय स्कूटर ही था, लेकिन हालात की गंभीरता को देखते हुए मैं उसी स्कूटर से मेरठ के लिए निकल पड़े, ताकि अगले दिन होने वाली घटनाओं और आंदोलनकारियों की यात्रा की स्थिति को करीब से देख सकें. रास्ते में मेरा स्कूटर पंचर भी हुआ और मुझे टायर बदलवाना पड़ा, लेकिन मैं सुबह तक अपने गंतव्य पर पहुंच गया था.
-कांती कुमार, वरिष्ठ पत्रकार-
महिलाओं के साथ यौन हिंसा भी हुई थी: दो अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर आंदोलनकारियों को रोकने के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ. इसके बाद पुलिस ने गोलीबारी की. इस कार्रवाई में कई आंदोलनकारियों की मौत हुई और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए. महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और यौन हिंसा के आरोप भी सामने आए, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर दिया.
रामपुर तिराहा कांड के बाद उत्तराखंड में गुस्से की लहर फैल गई. जगह-जगह प्रदर्शन हुए और सरकार के खिलाफ विरोध तेज हो गया. आंदोलनकारियों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताया और न्याय की मांग उठाई. इस घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को चर्चा के केंद्र में ला दिया. साथ ही आंदोलन और भी तेज हो गया.
इस पूरे संघर्ष में 20 हजार से अधिक लोगों पर मुकदमे दर्ज किए गए और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उस दौर की पुलिस कार्रवाई को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणी की थी. आंदोलन के दौरान हुई घटनाओं और पुलिस कार्रवाई को लेकर न्यायिक प्रक्रिया भी चली. रामपुर तिराहा कांड आज भी उत्तराखंड की सामूहिक स्मृति में एक गहरे जख्म की तरह मौजूद है.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
आंदोलन से राज्य गठन तक: केंद्र और उत्तर प्रदेश की राजनीति: 1994 के आंदोलन के बाद अलग राज्य की मांग को नजरअंदाज करना राजनीतिक दलों के लिए मुश्किल हो गया. पहाड़ के लोगों का गुस्सा और आंदोलन की व्यापकता केंद्र सरकार तक पहुंच चुका था. अलग-अलग राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करना शुरू किया. भारतीय जनता पार्टी ने अलग उत्तराखंड राज्य की मांग का समर्थन किया और इसे अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल किया.
तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लाल किले से की थी अलग राज्य की घोषणा: दूसरी ओर उत्तर प्रदेश की तत्कालीन राजनीति में भी इस मुद्दे पर बातचीत और अलग राज्य के स्वरूप को लेकर विचार-विमर्श चलता रहा. 15 अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने लाल किले की प्राचीर से उत्तराखंड राज्य के गठन की घोषणा की. यह अलग राज्य की मांग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव था.
पहली बार देश के प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय मंच से अलग उत्तराखंड राज्य बनाने की बात कही. इसके बाद भी राज्य गठन की प्रक्रिया तुरंत पूरी नहीं हुई. संसद, केंद्र सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के बीच कई स्तरों पर राजनीतिक बातचीत और संवैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ी. इस दौरान अलग राज्य की राजधानी, जिलों की व्यवस्था और प्रशासनिक ढांचे जैसे सवाल भी चर्चा में रहे.
जयसिंह रावत के मुताबिक राज्य गठन की प्रक्रिया में तब एचडी देवगौड़ा, मुलायम सिंह यादव और सतपाल महाराज सहित विभिन्नराजनीतिक नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही. पूर्व पीएम दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने आखिर में अलग राज्य की मांग को आगे बढ़ाया.
1 अगस्त 2000 को लोकसभा में पारित हुआ विधेयक:
उत्तर प्रदेश विधानसभा से संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक संसद में लाया गया. लोकसभा ने 1 अगस्त 2000 को विधेयक पारित किया और राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दी. 25 अगस्त 2000 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 अस्तित्व में आया. इसी अधिनियम के तहत उत्तर प्रदेश को विभाजित कर उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
9 नवंबर 2000 को मिला अलग राज्य: लंबे संघर्ष, राजनीतिक बातचीत और संवैधानिक प्रक्रिया के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तरांचल देश के नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. राज्य गठन के समय इसमें 13 जिले शामिल किए गए. देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया. बाद में 2007 में राज्य का नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया.
26 साल बाद भी वहीं खड़ा पहाड़ का आम आदमी: अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोगों को उम्मीद थी कि अब स्थानीय जरूरतों के मुताबिक विकास योजनाएं बनेंगी, युवाओं को रोजगार मिलेगा, गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर होंगी और पलायन पर रोक लगेगी. लोगों को यह भी उम्मीद थी कि पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचेगा और प्रशासन गांवों के करीब आएगा, लेकिन राज्य गठन के 26 साल बाद भी कई सवाल बने हुए हैं. पहाड़ के दूरस्थ गांवों से पलायन जारी है. रोजगार और बेहतर शिक्षा के लिए बड़ी संख्या में युवा मैदानी शहरों और दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं. स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सड़क संपर्क, आपदा प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर आज भी बड़ी चुनौतियां हैं.
स्थायी राजधानी का मुद्दा: गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग भी राज्य आंदोलन के समय से उठती रही है. गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया, लेकिन स्थायी राजधानी को लेकर बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. इसके अलावा पहाड़ और मैदान के बीच विकास के अंतर, स्थानीय संसाधनों पर अधिकार और प्रशासनिक विकेंद्रीकरण जैसे मुद्दे भी लगातार चर्चा में हैं.
कांति कुमार के मुताबिक
1994 के आंदोलन में स्थानीय अखबारों और पत्रकारों ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उस दौर में पत्रकारों के सामने खबरों को जुटाने और लोगों तक पहुंचाने की बड़ी चुनौती थी. कई बार पत्रकारों को अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना घटनास्थल तक जाना पड़ता था. आंदोलनकारियों की आवाज और पुलिस कार्रवाई से जुड़ी खबरों को सामने लाने में स्थानीय अखबारों ने अहम भूमिका निभाई.
-कांति कुमार, वरिष्ठ पत्रकार-
वहीं जय सिंह रावत का मानना है कि
उत्तराखंड राज्य आंदोलन को किसी एक नेता या संगठन की उपलब्धि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसमें लाखों आम लोगों की भागीदारी रही. महिलाओं, युवाओं, कर्मचारियों, बुजुर्गों और ग्रामीणों ने अपने स्तर पर संघर्ष किया. यही वजह है कि 1994 का आंदोलन किसी एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की सामूहिक जनक्रांति बन गया.
-जय सिंह रावत, वरिष्ठ पत्रकार-
उत्तराखंड राज्य आंदोलन का इतिहास हमें बताता है कि अलग राज्य की मांग केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने का प्रयास नहीं थी. इसके पीछे बेहतर प्रशासन, स्थानीय पहचान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, संसाधनों पर अधिकार और पहाड़ की परिस्थितियों के अनुरूप विकास की उम्मीद थी.
9 नवंबर 2000 को अलग राज्य बनने के साथ एक लंबे संघर्ष का एक अध्याय जरूर पूरा हुआ, लेकिन आंदोलन के दौरान लोगों ने जिस उत्तराखंड का सपना देखा था. उसे पूरी तरह साकार करने की जिम्मेदारी आज भी सरकारों और समाज के सामने है. यही वजह है कि राज्य आंदोलन की सौ साल की कहानी केवल अतीत को याद करने का विषय नहीं, बल्कि आज के उत्तराखंड के विकास और भविष्य को समझने का भी एक जरूरी आधार है.
