‘शेर कभी कुत्ते का शिकार नहीं करता’ पूर्व सीएम त्रिवेंद्र का बयान, तोड़-मरोड़ कर पेश किया बयान , अवैध खनन पर जताई चिंता।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने संसद में अवैध खनन का मामला ऐसे समय पर उठाया ,जब धामी सरकार  पूर्व मंत्री रहे प्रेमचंद अग्रवाल प्रकरण से  सरकार की चौतरफा घिरी हुई है। अग्रवाल ने विधानसभा में पहाड़ी समाज को अशब्द कहे जिसको विधानसभा अध्यक्ष ऋतू खंडूरी ने रोकने की बजाय विपक्ष के विधायक लखपत सिंह बुटोला ने जब अग्रवाल के बयान का‌ विरोध किया तो ऋतु खंडूरी ने बुटोला को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। पूरे प्रकरण में अक्सर अपने बयानों से पार्टी की फजीहत कराने वाले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने मामले को सुलझाने के बजाय और उलझा दिया। उनके द्वारा पूर्व मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के पक्ष में खड़े दिखाई दे और विरोध करने वालों को ही नसीहत दे डाली। विरोध करने वालों को सड़कछाप तक कह दिया। जिससे लोग और भड़क गए। कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल का पूर्व में दिया बयान को लेकर भी लोगों में नाराजगी देखने को मिल रहा है। बढ़ते विवाद जनता के भारी दबाव के चलते मुख्यमंत्री धामी एक्शन में आए और प्रेमचंद अग्रवाल को मंत्रिमंडल से हटना पड़ा। इसके बाद फिर पहाड़ मैदान की लड़ाई देखने को मिला। इस बीच जहां एक ओर भाजपा संगठन धामी सरकार के 3 साल के कार्यकाल का जश्न मना रही थी । जगह जगह सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रख रही थी । वहीं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस जश्न पर पानी फेरते हुए राज्य में चल रहे अवैध खनन का मामला एक बार फिर उठाते हुए इस पर चिंता जताई। पूर्व मुख्यमंत्री ने हालांकि नियम के तहत ही इस मुद्दे को उठाया । जिससे राज्य में खलबली मचनी लाजमी है। रावत के संसद में दिए बयान को पहले खनन सचिव बृजेश कुमार संत ने पूरी तरह से नकार दिया।

जिसके बाद पूर्व सीएम का मीडिया में एक और बयान चला जिसमें एक सवाल के जबाब में कहा कि शेर कभी कुत्तों का शिकार नहीं करता। फिर क्या था । बयान पर और बबाल मचा दिया। धामी सरकार की जो फजीहत हो रही है वह किसी से छूपी नहीं है । पूरे प्रकरण पर संगठन की तरफ से राजपुर विधानसभा के विधायक खजानदास, महेंद्र भट्ट, केंद्रीय मंत्री अजय टम्टा, राज्य सभा सांसद नरेश बंसल, सांसद कल्पना सैनी आदि सरकार के पक्ष में बयान देते नजर आये। और पूर्व मुख्यमंत्री के संसद में दिए बयान को निराधार बताया। ‘
शेर कभी कुत्ते का शिकार नहीं करता ‘कहावत पर आईईएस लौबी ने एक पत्र जारी किया। हालांकि उस पत्र में किसी का नाम नहीं था लेकिन नाराजगी जताई गई। बढ़ते विवाद को देखते हुए आज पूर्व सीएम रावत ने पत्रकारों के सवालों का जबाब दिया । उन्होंने कहा कि पन्द्रह साल राज्य की विधानसभा का सदस्य रहे , विधायक, मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बने सभी अधिकारियों के साथ तालमेल के साथ काम किया । उनके शेर वाले बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया जबकि उसका भाव को समझा नहीं गया वह एक कहावत है मात्र किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से नहीं कही गई। लेकिन खनन को लेकर उन्होंने जो‌ बात कही उसको उन्होंने संसद में नियमानुसार उठाया। अब यहां कयी सवाल खड़े होते हैं।‌दो तीन दिन से रावत के बयान को लेकर प्रदेश में जो भूचाल आया । उनके खनन को लेकर संसद में उठाए सवाल को बृजेश कुमार संत को आगे क्यों किया गया?  क्या एक ब्यूरोक्रेट्स को राजनीतिक बयान देने चाहिए । जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है संसद में उठाये गये सवाल का जबाब एक अधिकारी कैसे दे सकता है। पार्टी बैकफुट पर है रावत ने जो खनन का मामला उठाया वह गंभीर विषय है प्रदेश में दिन में भी अवैध खनन धड़ल्ले से जारी है । राजधानी में ही विकासनगर, रायपुर क्षेत्र, मोथरोंवाला से बुल्लावाला के बीच में अवैध खनन दिनदहाड़े बड़ी मात्रा में चल रहा है। कल ही विकासनगर क्षेत्र का एक वीडियो सामने आया। पूर्व सीएम ने राजस्व बढ़ने पर सरकार की तारीफ भी की लेकिन अवैध खनन को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा पर्यावरण को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। और जो‌ खनन नीति है उसके हिसाब से यदि खनन किया जाए तो कोई आपत्ती नही है। पर जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण के खिलाफ खनन हो रहा है वह ठीक नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री रावत की चिंता को सोशल मीडिया में जमकर तारीफ हो रही है।

विपक्ष भी उनकी बात से सहमत है‌। और सरकार पर निशाना साध रहा है। अब बात करें उन सांसदों की जो एकाएक प्रकट होकर त्रिवेंद्र की बयान‌ की आलोचना कर रहे हैं । उनसे यह सवाल तो बनते हैं जब प्रदेश में प्रेमचंद अग्रवाल ने विधानसभा में जो‌ बयान दिया उस समय वे खामोश क्यों रहे। उस समय एकमात्र पूर्व मुख्यमंत्री रावत ही थे जिन्होंने अग्रवाल के बयान पर खेद जताया साथ में सरकार के बचाव में भी दिखाई दिए । बाद पौड़ी सांसद अनिल बलोनी ने भी इस बयान की निंदा की। त्रिवेंद्र को जो करीब से जानते हैं वह अपने कार्य और बयानों में स्पष्टता रखते हैं । गोलमोल जवाब नहीं देते। मुख्यमंत्री रहते प्रदेश हित में कई चौंकाने वाली फैसले लिए । कुछ बड़े फैसले देवस्थानम बोर्ड,और गैरसैंण को मंडल बनाने का फैसला था वह प्रदेश हित में थे जो राजनीतिक कारणों से ठंडे बस्ते में डाल दिए गये । बिना कारण बताए उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया। फिर भी वे पार्टी के अनुशासित कार्यकर्ता के रुप में कार्य‌ कर रहे हैं। आज जो उन पर ऊंगली उठा रहे हैं ‌। उन पर रावत की कृपा कहीं ना कहीं रही जिस पद पर वे आज बैठे हैं। राजनीति है एक दूसरे की टांग खिंचाई होती है पर त्रिवेंद्र की छवि पर कोई आंच नहीं आयी। उनकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है। जो भी हो रावत के खनन पर दिए बयान से प्रदेश की राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल पैदा हो गई है।

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